Wednesday, 11 November 2015

मुग़ालते

हर इक शख़्स के छुपे कई राज़ थे
दिल-ए-गद्दार में दफ़्न कई राज़ थे

मुग़ालतों में जीते रहे ज़िन्दगी
अपनों से कहाँ हम नाराज़ थे
दिल-ए-गद्दार में दफ़्न कई राज़ थे

जो बना सो  किया हमने बेफ़िक्र
फ़िर उन्हें क्यों लगा कि हम धोकेबाज़ थे
दिल-ए-गद्दार में दफ़्न कई राज़ थे

बस रुक गए राही जब उनकी ख्वाहिश हो गयी
जब अकेले ही थे हम भी बहुत जाँबाज़ थे
दिल-ए-गद्दार में दफ़्न कई राज़ थे

वो सुलगती है रुक रुक के आज भी
चिंगारी भड़की थी जो जब आपके ख़ास थे
दिल-ए-गद्दार में दफ़्न कई राज़ थे

हर इक शख़्स के छुपे कई राज़ थे
दिल-ए-गद्दार में दफ़्न कई राज़ थे

-- राही

Thursday, 5 November 2015

चाँद को पा सकूँ बस, मैंने छोटा सा ख्वाब देखा है

वो जो निकले थे चुपचाप से ,ढककर नक़ाब देखा है
वक़्त के साथ साथ  ज़माने को ,होते बे नक़ाब देखा है

ना क़ाबिल से हौले हौले हो गए वाइज़ वही
कुछ सीखें बड़ों ने दीं ,कुछ अपने आप देखा है
वक़्त के साथ साथ  ज़माने को ,होते बे नक़ाब देखा है

मानते हैं आसान नहीं राही ,आसमान को बांधना
चाँद को पा सकूँ बस, मैंने छोटा सा ख्वाब देखा है
वक़्त के साथ साथ  ज़माने को ,होते बे नक़ाब देखा है

जुस्तुजू ही जुस्तुजू है,  उफनते थर्राते सवाल
राह में टकरा गया मुस्कुराता जवाब देखा है
वक़्त के साथ साथ  ज़माने को, होते बे नक़ाब देखा है

किसी पत्थर में नहीं न किसी ताबीज़ में
अपने अंदर झाँककर रहीम -ओ-राम आज देखा है
वक़्त के साथ साथ  ज़माने को ,होते बे नक़ाब देखा है

ना कर मुक़द्दर को बदनाम आये दिन राही यूँही
अपनी हथेली पे लिखते प्यादे को तख़्त-ओ-ताज देखा है
वक़्त के साथ साथ  ज़माने को ,होते बे नक़ाब देखा है

चाँद को पा सकूँ बस, मैंने छोटा सा ख्वाब देखा है