Tuesday, 21 April 2015

क़ैद

वो नयी दीवानगी थी, और नया सिलसिला था
अब कहाँ फ़िर चलेगा जो चला वो सिलसिला था ॥

याद तो आता है कुछ कुछ, धुंधला धुंधला सा तसव्वुर
हाँ ज़रा सी देर को, वो कभी मुझसे मिला था ।

अब कहाँ फ़िर चलेगा जो चला वो सिलसिला था ॥

अब तो हम भी क़ैद  में हैं, और तुम भी क़ैद  में
 क़ैद - ए - आदत में ख्याल, बंद पिंजरे में मिला था ।

अब कहाँ फ़िर चलेगा जो चला वो सिलसिला था ॥

आवारा अनजान सड़कों पे दर-ब-दर फ़िरता तो हूँ
पर कहीं मिलता नहीं, वो ख्वाब जो दिल में खिला था ।

अब कहाँ फ़िर चलेगा जो चला वो सिलसिला था ॥

'राही ' कुछ न बोलिये, आईये और कीजिये
दफ़्न मेरे साथ ही, जो कोई शिक़वा ग़िला था ।

अब कहाँ फ़िर चलेगा जो चला वो सिलसिला था ॥

वो नयी दीवानगी थी, और नया सिलसिला था
अब कहाँ फ़िर चलेगा जो चला वो सिलसिला था ॥

No comments:

Post a Comment