Thursday, 24 July 2014

|| कहानी - सवाल ||

पहले पहर, काला आसमान
चमकता चन्द्रमा, घोर सुनसान
सबके स्वप्न, सब सोते थे
पर वो क्यों जाग जाती थी ?

दो पहर की तेज़ धूप
जलता सूरज, विनाश रूप
सब ढूंढ़ के छाया छिप जाते थे
पर वो क्यों दिन में जलता था ?

सुहानी शाम का मज़ा
आकाश कई रंगों से सजा
सब रेत के महल बनाते थे
पर वो क्यों चूल्हे में तपती थी ?

छत पे औंधे - सीधे लेटकर
बदरयी आँखों से चीरकर
सब तारे गिना करते थे
पर वो क्यों हिसाब लगाता था ?

ये एक दिन की बात नहीं
एक मौसम का जज़्बात नहीं
सब यूँही पहर बिताते थे
और साल बीत जाता था ।

बाप की है, माँ की है
अभी कहानी बाकी है
सब के लिए करते करते
जब बुढ़ापा सा आ जाता है ।

तब मौसम निकलने से पहले
ये पहले , वो पहले , तुम पहले
सब बहस बतोले  करते हैं
और साल भी बांटा जाता है ।

इसकी बारी , उसकी बारी
माँ बाप बने ज़िम्मेदारी
'राही' देख तमाशा करते हैं
दिल में सवाल वही फिर आते हैं ।

पर माँ क्यों जाग जाती थी ?
पर बाप क्यों दिन में जलता था ?
पर माँ क्यों चूल्हे में तपती  थी ?
पर बाप क्यों हिसाब लगता था ?
कैसे पहर पहर , दिन  दिन ?
कैसे मौसम, कैसे साल ?
जाने कैसे सारी उमर
एक जोड़ा, सबका ज़िम्मा उठाता था ?
 क्यों सब का ज़िम्मा उठाता था ?

जब सब ज़िम्मा बांटा करते हैं ?
क्यों सब ज़िम्मा बांटा करते हैं ?

 -- राही