Friday, 18 April 2014

फ़रिश्ता

आए थे मगर वो लौट के जाने के लिए
जला तो था चिराग लेकिन बुझ जाने के लिए ॥

वो फ़रिश्ता था जो आया था बनाने मुझको
 क्यों मिट रहा है खुद मुझे बनाने के लिए  ॥

जाते जाते भी नयी सीख मुझको देता है
कोई रहता नहीं 'राही' ज़माने के लिए ॥

पुछा करते हैं ख़ैरियत मेरे जानने वाले
मुस्कुरा देता हूँ मैं बस ग़म छुपाने के लिए ॥

कभी तोड़ के देखो फ़रेब का आईना
जगह ढूँढ़ते होगे चेहरा छुपाने के लिए ॥

मेरे ख्वाबों को सलीका कभी न आया
लूटा दूंगा मैं सब कुछ उसे पाने के लिए ॥

आये थे मगर वो लौट के जाने के लिए 

-- राही