Sunday, 23 March 2014

|| मुन्तज़िर ||

उन आँखों की चमक में कोई दर्द छुपा बैठा था 
जिसको ढूँढतीं थीं वो, ना जाने कहाँ बैठा था ॥ 

मुन्तज़िर ये दिल, उनके दीदार के लिए 
चुपचाप देखता, अपना चैंन गवां बैठा था ।
जिसको ढूँढतीं थीं वो, ना जाने कहाँ बैठा था ॥ 

मुसलसल चल रहा था ये, सिलसिला इक अर्से से 
ये दर्द मीठा सा, लब-ए-ग़ज़ल बन बैठा था । 
जिसको ढूँढतीं थीं वो, ना जाने कहाँ बैठा था ॥

वो चाँद सीं माना, राही उनकी मोहब्बत में 
होकर के दीवाना, दिल बादल बन बैठा था । 
जिसको ढूँढतीं थीं वो, ना जाने कहाँ बैठा था  ॥ 

झूठ कहते हैं कि इश्क़ आग का दरिया है 
मौत आयी तो, ये दिल उनके दामन में बैठा था । 

उन आँखों की चमक में कोई दर्द छुपा बैठा था
जिसको ढूँढतीं थीं वो, ना जाने कहाँ बैठा था ॥
 -- राही