Wednesday, 29 January 2014

|| इंसान ||

मुझको न दे भरोसा इस मुकद्दर का
मानता है तू जिसे, है ख़ुदा वो पत्थर का ॥

इन्साफ की बातें न कर ज़ोरों शोरों से
देखा है ईमान भी, मैंने तेरे अंदर का ॥

देखने में गाढ़ा कोई, कोई हल्का सा
एक ही रंग मानले तू नीला, समंदर का ॥

इंसान ही की औलाद है 'राही' सब कोई
मौलवी हो चाहे कोई, पंडा मंदिर का ॥

मुझको सिखाने आए हैं वाईज़ ज़माने के
इल्म जिनको  नहीं, बेखुद तसव्वुर का ॥

 हर कदम आवारगी से क्या हुआ हासिल
अब करूँ क्या बयां, जन्नत के मंज़र का ॥

मुझको न दे भरोसा इस मुकद्दर का
मानता है तू जिसे, है ख़ुदा वो पत्थर का ॥

-- राही