Thursday, 19 September 2013

इश्क

ना गुनहगार हम थे, न गुनहगार तुम थे
हम वफ़ा मांगते रहे, तुम वफ़ा करते रहे
मगर दौर ही कुछ ऐसा था 'राही'
हम इस ओर रह गए , तुम उस ओर चलते रहे

बर्दाश्त की भी एक हद है राही
अनचाहे ज़रूर मगर फासले बढ़ते रहे
तुम शमा की तरह रौशन हो गए
हम जुगनू बने और जलते रहे

जाने कहाँ गया

जाने कहाँ गया
वो लम्हा
फुर्सत का
जो  सोचने का
मौका तो दिया करता था ?

जाने कहाँ गया
वो रिश्ता
इंसानियत का
जो हमारे साथ
हर इक रोज़ जिया करता था  ?

जाने कहाँ गया
वो प्यार
बगैर शर्तों का
जो लैला से मजनू
बेपरवाह किया करता था
जो मुरली वाले से
जोगन मीरा को हुआ करता था ?

जाने कहाँ गया
वो परिवार
मेरा अपना सा
जो मुसीबतों में
मेरा साथ दिया करता था ?

जाने कहाँ गयी
वो सादगी
ग़ज़लों की
जो स्याही में रंगे शब्दों को
ज़ाया न होने देती थी ?

जाने कहाँ गयी
वो आज़ादी
आवारा सी
जो खुदसे भी
ख़िलाफ़त किया करती थी ?

छीन लिया 'राही'
छीन लिया
आज़ादी को पैसों की खनक ने
सादगी को ज़िन्दगी की उलझनों ने
परिवार को महत्वाकांक्षाओं  ने
प्यार को संघर्ष की कमियों ने
रिश्तों को स्वार्थी नीयतों ने


मगर लम्हा
जाने कहाँ गया लम्हा


वो लम्हा
फुर्सत का
जो सोचने का
मौका तो दिया करता था
जाने कहाँ ?
-- राही