Thursday, 18 July 2013

अब बस नाम बाकी है - ग़ज़ल


|| ग़ज़ल  ||

अब अरमान नहीं कोई कि जिंदा हूँ ये काफी है
अपने ख्वाबों का सौदा कर (ज़माने से ) कुछ सांसें खरीदी हैं |

अब भूखा नहीं सोता कि खाने को तो काफी है
गुलामी कर रक़ीबों की, दो रोटी खरीदी हैं |

मरने के लिए भी तो 'राही' जीना ज़रूरी है
न जिंदा हूँ न मुर्दा हूँ, बस धड़कन ही बाकी है |

याद करता हूँ अपनी ही, मेरी मजबूरी है
न ख़ुद में ही बचा हूँ मैं , बस नाम बाकी है
इस कदर मिटा हूँ मैं , अब बस नाम बाकी है  |

अब अरमान नहीं कोई कि जिंदा हूँ ये काफी है
अपने ख्वाबों का सौदा कर (ज़माने से ) कुछ सांसें खरीदी हैं |


-- राही

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