Tuesday, 14 May 2013

त्रिवेणी - अपना गाँव छोड़ आया था ।

शाम की तन्हाई में
मन  के तहखाने से
देखो, क्या मिला मुझे ?

वो बिसरा बक्सा जो
गाये गाँव के गीतों को ,
शहर की धुल में गुम था ।

कुछ मांगे हुए
कुछ चुराए हुए
सपने समेट लाया था ।

चादर में बांधकर मैं
बक्से में डालकर मैं
लम्हे लपेट लाया था ।

खुद को आजमाने को
उड़ने ऊंची उड़ानों को
जब अपना गाँव छोड़ आया था ।

जैसे ही ताला खोला
पड़ोस का भोला छोटू बोला
मेरी रेसिंग ग़ाड़ी लाये हो ?

डूब गया मैं यादों में
बक्से के काले जादू में
सारा गाँव इसी में बसा हुआ !

कुछ कौड़ी और चिये
यार पुराने फिर से मिले
चंदा पौआ खेलोगे क्या ?

लाल धागे से बंधी हुई
किताब आधी फटी हुई
दिखे मास साब का सा चेहरा ।

पीली कमीज़ चमकदार ज़री
अब धुंधली सी लगने लगी
भाई की चुराकर लाया था ।

रुकी हुई चुपचाप पड़ी
बाबा की दी कलाई घड़ी
ने वक़्त भी जैसे रोक दिया ।

ज्यों ही कांच की बरनी खोली
अचार की खुशबू बोली
बेटा , रोटी खायी  ना ?

आँखें नम सी होने लगीं
माँ अपना आँचल देने लगीं
की मोबाइल की घंटी ने काला जादू तोड़ दिया

भूल गया था शायद मैं
ऊंची ऊंची उड़ानों में
अपना गाँव साथ ले आया था

जब अपना गाँव छोड़ आया था

कुछ मांगे हुए
कुछ चुराए हुए
सपने समेट लाया था ।

चादर में बांधकर मैं
बक्से में डालकर मैं
लम्हे लपेट लाया था ।

अपना गाँव साथ ले आया था
जब अपना गाँव छोड़ आया था

8 comments:

  1. Mitti ki khusboo aa gayi is kavita me....mazedaar....

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  2. Mitti ki khusboo aa gayi is kavita me.....bahut umda....

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  3. Great lyrics....gr8 thoughts ...altogether simply awesome bro..!!!

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  4. great Combination of words which creats magic while reading...truly awsom...

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  5. बहुत सुन्दर भाव, उत्तम शब्द संयोजन, सुन्दर कविता...
    आपका मेरे ब्लॉग पर भी स्वागत है..

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