Thursday, 24 January 2013

।। माया सत्य का ही प्रतिबिम्ब है ।।


सुबह की शांत प्रार्थना में
शाम की मधुर ध्वनियों में
धुप की जलती किरणों में
रात की चुभती सर्दी में
प्रश्न मन में उठता है
सत्य क्या असत्य क्या है
मोह क्या माया क्या है
मैं क्या हूँ मेरा क्या है ।।

सदैव बदलती ऋतुओं  में
जीवन में और म्रत्यु में
चिर विचरण इस जग में
जो है सब बदलता है
कुछ से कुछ और ही बनता है
सत्य क्या असत्य क्या है
मोह क्या माया क्या है
मैं क्या हूँ मेरा क्या है ।।

काल की अदभुत धारा में
नश्वर शरीर की आत्मा में
अंतर्ज्ञान की गहराई में
प्रत्यॆक आते जाते क्षण में
कुछ मेरा नहीं सब मेरा है
विचार सब सापेक्ष  हैं
ब्रह्माण्ड पल का बिम्ब है
माया है सब सब माया है
माया सत्य का ही प्रतिबिम्ब है ।।

2 comments: