Thursday, 28 November 2013

बेवजह

उनकी आँखों में  नज़र आया मुझे मेरा नसीब
गिरते अश्कों में पाया है तसव्वुर अपना ॥

ये ग़लत है  कि वफ़ा इश्क़ का पैमाना है
मेरी आदत थी ऐतबार की, उनकी वादे करना ।
गिरते अश्कों में पाया है तसव्वुर अपना ॥

 क्या ज़रूरी है  हर मुलाक़ात का कोई अंजाम ही हो
अच्छा लगता है उनसे यूँ बेवजह मिलना जुलना ।
गिरते अश्कों में पाया है तसव्वुर अपना ॥

नहासिल ही मोहब्बत का हासिल 'राही'
ये समझलो तो फ़िर आसां है मोहब्बत करना ।
गिरते अश्कों में पाया है तसव्वुर अपना ॥

उनकी आँखों में  नज़र आया मुझे मेरा नसीब
गिरते अश्कों में पाया है तसव्वुर अपना ॥

-- राही

Tuesday, 8 October 2013

शोर

सुनो
कितना शोर
सब ओर सब ओर
 
मैं, तुम, हम
मेरा, तुम्हारा, हमारा
फ़िर  मैं. तुम. हम
फ़िर से मेरा, तुम्हारा, हमारा
 
अहंकार ।

सुनो
कितना शोर
सब ओर सब ओर
 
कुछ नहीं , कुछ , सब कुछ
और , थोड़ा  और,  अब बस
दोबारा कुछ नहीं, कुछ, सब कुछ
नोचो और, थोड़ा  और, और फिर बस
 
मोह ।

सुनो
कितना शोर
सब ओर सब ओर
 
असीमित रूह की देह
या सीमित देह की आत्मा
जनम मृत्यु बिछुड़ाव 
लगातार  जनम मृत्यु बिछुड़ाव

चक्र । 

सुनो
कितना शोर
सब ओर सब ओर
 
रूदन मनन चिंतन
सत्य असत्य मोक्ष
और रूदन मनन चिंतन
खोज सत्य असत्य मोक्ष
 
शून्य ।


सुनो
कितना शोर
सब ओर सब ओर
-- राही

Thursday, 19 September 2013

इश्क

ना गुनहगार हम थे, न गुनहगार तुम थे
हम वफ़ा मांगते रहे, तुम वफ़ा करते रहे
मगर दौर ही कुछ ऐसा था 'राही'
हम इस ओर रह गए , तुम उस ओर चलते रहे

बर्दाश्त की भी एक हद है राही
अनचाहे ज़रूर मगर फासले बढ़ते रहे
तुम शमा की तरह रौशन हो गए
हम जुगनू बने और जलते रहे

जाने कहाँ गया

जाने कहाँ गया
वो लम्हा
फुर्सत का
जो  सोचने का
मौका तो दिया करता था ?

जाने कहाँ गया
वो रिश्ता
इंसानियत का
जो हमारे साथ
हर इक रोज़ जिया करता था  ?

जाने कहाँ गया
वो प्यार
बगैर शर्तों का
जो लैला से मजनू
बेपरवाह किया करता था
जो मुरली वाले से
जोगन मीरा को हुआ करता था ?

जाने कहाँ गया
वो परिवार
मेरा अपना सा
जो मुसीबतों में
मेरा साथ दिया करता था ?

जाने कहाँ गयी
वो सादगी
ग़ज़लों की
जो स्याही में रंगे शब्दों को
ज़ाया न होने देती थी ?

जाने कहाँ गयी
वो आज़ादी
आवारा सी
जो खुदसे भी
ख़िलाफ़त किया करती थी ?

छीन लिया 'राही'
छीन लिया
आज़ादी को पैसों की खनक ने
सादगी को ज़िन्दगी की उलझनों ने
परिवार को महत्वाकांक्षाओं  ने
प्यार को संघर्ष की कमियों ने
रिश्तों को स्वार्थी नीयतों ने


मगर लम्हा
जाने कहाँ गया लम्हा


वो लम्हा
फुर्सत का
जो सोचने का
मौका तो दिया करता था
जाने कहाँ ?
-- राही

Thursday, 18 July 2013

अब बस नाम बाकी है - ग़ज़ल


|| ग़ज़ल  ||

अब अरमान नहीं कोई कि जिंदा हूँ ये काफी है
अपने ख्वाबों का सौदा कर (ज़माने से ) कुछ सांसें खरीदी हैं |

अब भूखा नहीं सोता कि खाने को तो काफी है
गुलामी कर रक़ीबों की, दो रोटी खरीदी हैं |

मरने के लिए भी तो 'राही' जीना ज़रूरी है
न जिंदा हूँ न मुर्दा हूँ, बस धड़कन ही बाकी है |

याद करता हूँ अपनी ही, मेरी मजबूरी है
न ख़ुद में ही बचा हूँ मैं , बस नाम बाकी है
इस कदर मिटा हूँ मैं , अब बस नाम बाकी है  |

अब अरमान नहीं कोई कि जिंदा हूँ ये काफी है
अपने ख्वाबों का सौदा कर (ज़माने से ) कुछ सांसें खरीदी हैं |


-- राही

Tuesday, 25 June 2013

हौसला

जल रहा हूँ धीरे धीरे, तो तुम्हे तकलीफ़  क्या
होकर धुआं धुआं सही, चाँद पा ही जाऊंगा ॥ 
 
चल रहा नए रास्तों पे , राह में कांटे तो क्या
होकर ज़ार ज़ार भी, पार कर ही जाऊंगा ॥ 
 
बढ़ रहा लहरों से लड़के, आ गया तूफ़ान तो क्या
हौसलों की कश्तियों से, किनारे पे आ ही जाऊंगा ॥ 
 
रो रहा हूँ चुपके चुपके, आँखें सूखीं हैं तो क्या
होगी ये बरसात भी, जब मैं जीत जाऊंगा ॥

जल रहा हूँ धीरे धीरे, तो तुम्हे तकलीफ़  क्या
होकर धुआं धुआं सही, चाँद पा ही जाऊंगा ॥

-- राही

इश्क

अब तेरे आने से भी क्या नया हो जायेगा
जल रहा जो आशियाना खाख हो ही जायेगा ।


दम नहीं अश्कों में तेरे कि बुझा दें आग ये
इश्क वो शोला है जो और भड़क ही जायेगा ।
अब तेरे आने से भी क्या नया हो जायेगा


हाँ भुलाने की भी कोशिश नहीं करता है दिल
याद मिट भी जाएगी पर दर्द लौट आयेगा ।
अब तेरे आने से भी क्या नया हो जायेगा


घुल रहा वो धीरे धीरे तो तुम्हे तकलीफ़ क्या
होकर धुआं धुआं सही चाँद पा ही जायेगा ।
अब तेरे आने से भी क्या नया हो जायेगा


चल रहा टूटा हुआ कब तक मगर चल पायेगा
आखिर 'राही' भी बिखर्खर राह में मिल जायेगा ।
अब तेरे आने से भी क्या नया हो जायेगा

 
अब तेरे आने से भी क्या नया हो जायेगा
जल रहा जो आशियाना खाख हो ही जायेगा ।
- राही

Monday, 24 June 2013

कहा था तुमने कि तुम परछाईं हो मेरी
सच ही तो कहा था
कल, रात आकर मेरे कानों में कह गयी

Tuesday, 14 May 2013

त्रिवेणी - अपना गाँव छोड़ आया था ।

शाम की तन्हाई में
मन  के तहखाने से
देखो, क्या मिला मुझे ?

वो बिसरा बक्सा जो
गाये गाँव के गीतों को ,
शहर की धुल में गुम था ।

कुछ मांगे हुए
कुछ चुराए हुए
सपने समेट लाया था ।

चादर में बांधकर मैं
बक्से में डालकर मैं
लम्हे लपेट लाया था ।

खुद को आजमाने को
उड़ने ऊंची उड़ानों को
जब अपना गाँव छोड़ आया था ।

जैसे ही ताला खोला
पड़ोस का भोला छोटू बोला
मेरी रेसिंग ग़ाड़ी लाये हो ?

डूब गया मैं यादों में
बक्से के काले जादू में
सारा गाँव इसी में बसा हुआ !

कुछ कौड़ी और चिये
यार पुराने फिर से मिले
चंदा पौआ खेलोगे क्या ?

लाल धागे से बंधी हुई
किताब आधी फटी हुई
दिखे मास साब का सा चेहरा ।

पीली कमीज़ चमकदार ज़री
अब धुंधली सी लगने लगी
भाई की चुराकर लाया था ।

रुकी हुई चुपचाप पड़ी
बाबा की दी कलाई घड़ी
ने वक़्त भी जैसे रोक दिया ।

ज्यों ही कांच की बरनी खोली
अचार की खुशबू बोली
बेटा , रोटी खायी  ना ?

आँखें नम सी होने लगीं
माँ अपना आँचल देने लगीं
की मोबाइल की घंटी ने काला जादू तोड़ दिया

भूल गया था शायद मैं
ऊंची ऊंची उड़ानों में
अपना गाँव साथ ले आया था

जब अपना गाँव छोड़ आया था

कुछ मांगे हुए
कुछ चुराए हुए
सपने समेट लाया था ।

चादर में बांधकर मैं
बक्से में डालकर मैं
लम्हे लपेट लाया था ।

अपना गाँव साथ ले आया था
जब अपना गाँव छोड़ आया था

Wednesday, 24 April 2013

|| फिर से प्यार हमें हो जायेगा ||



 
ज़िन्दगी के कामों में
महंगे महंगे बाजारों में
राशन की कतारों में
तुम मुझको भूल न जाना
तुम मेरा साथ निभाना । 
मुशिकलें बहुत सारी हों
रोज़गार की मारामारी हो
चाहे जैसी दुनियादारी हो
तुम मुझको भूल न जाना
तुम मेरा साथ निभाना ।
रुकना न चाहे कुछ हो
थकना न चाहे कुछ हो
बदलाव चाहे कुछ हो
तुम मुझको भूल न जाना
तुम मेरा साथ निभाना ।
ये दुनिया चलती जाएगी
उमर भी ढलती जाएगी
उन साथ बिताये लम्हों की
पूरे हो चुके सपनों की
और तेरी मेरी सांसों की
वो बातें जो हम करते थे
याद तुम्हे जब आएँगी
आँखें नम हो जाएँगी  ।
लब पे होंगे न शब्द कोई
ये मेरी लिखी कवितायेँ भी
भूली बिसरी हो जाएँगी
वो शाम जब भी आयेगी
मुझको देना आवाज़ कोई
या हाथ बढ़ाना तुम अपना
मैं थाम के हाथ फिर से तब
आगे तुम्हे ले जाऊंगा
साथ तुम्हारा निभाऊंगा ।
वो सहर होगी जीवन की
ढलता होगा दिन कोई
शुरुआत करेंगे हम फिर से
फिर देखेंगे हम साथ वही
चाँद को पाने के सपने
जीवन थमता जायेगा
हाँ, जीवन थमता जायेगा
पर, फिर से प्यार हमें हो जायेगा ।

- राही

Thursday, 4 April 2013

Take me to the Heaven - Lyrics

I feel heavy
I feel heavy
I don't feel alive


Show me the way
Show me the way
So I can't die

Take me to the heaven
Take me to the heaven
Or Just Make me Fly
Oh yeah make me fly
Just make me fly
Take me to the heaven
Take me to the heaven


I want to be free
I want to be free
I just can't be tied

It is dark here
It is too dark here
I can't see no light

Take me to the heaven
Take me to the heaven
Or just give me some light
Oh yeah give me some light
Just give me some light
Take me to the heaven
Take me to the heaven

There's nothing inside me
There's nothing inside me
I left my soul behind

I am not dying
I am not dying
I am rising high

Take me to the heaven
Take me to the heaven
Or just let me die
Oh yeah let me die
Just let me die
Take me to the heaven
Take me to the heaven.

- Rishish

Tuesday, 2 April 2013

|| इनसे आवाज़ आती है अब भी ||

Photo Courtesy : Neha 

कितनी कहानियां कितने किस्से
बसे हैं पुरानी पत्थर की दीवारों में
जो अब बस बंजर सी इमारत हैं
इनसे आवाज़ आती है फिर भी 

तस्वीर बोलती हो जैसे
इतिहास के पन्ने
आहिस्ता आहिस्ता पलट रहे हों 

गवाही दे रही हो जैसे
दिलेरी की मोहब्बतों की
सदियों से अनजान दास्तानों की

कोना कोना रो रहा हो जैसे
'राही' तेरी बर्बादी पर
इनसे ज़्यादा तो तू टूटा है

इनसे आवाज़ आती है अब भी  |

 
कितनी कहानियां कितने किस्से
बसे हैं पुरानी पत्थर की दीवारों में
जो अब बस बंजर सी इमारत हैं
इनसे आवाज़ आती है फिर भी

Tuesday, 12 March 2013

Smart Agile Computers, Smart Agile Systems and Smart Agile People ?



Smart Agile Computers, Smart Agile Systems and Smart Agile People ?

In the modern age of technology we have come along a long way since the digital revolution happened to the world. By accident or by choice the third industrial revolution has made the world a global village to use the cliché. It has helped generate huge number of jobs and opportunities for entrepreneurs in IT and software industry. Someone like Dr. Sugata Mitra, who prepared the first curriculum of NIIT could foresee the kind of jobs that lay ahead in the future. People like him, institutes like NIIT and number of other engineering colleges established a skill development system and embedded it, in far more established and well constructed education system so very well integrated and seamlessly that we today have one of the biggest IT workforce in the world.

Mobile revolution was next big thing that came along the digital revolution and is still evolving fast and furious. Indeed mobile technology has changed the way communication used to happen. Software computing and digital electronics have even made many of the seemingly indispensable things obsolete. Agile Methodology which is said to be introduced by Toyota in manufacturing industry found its way in software programming and  has triggered the pace of the development of new technologies that are coming up today. New technologies and features are being introduced in so short spans of time that technologies just five years old seem to be outdated.

What digital revolution has done to us is that it has not just changed the way we used to communicate but it has changed the way we used to live as well in many ways. It has changed the way people used to work. We evolved and adapted quickly to the changes in style of work but today is the need that we evolve quicker and adapt faster to newer systems. The trends and recent researches show that today we need to evolve faster than ever before. We need to predict quickly how the future jobs will be and have to be ready for them. May be in jobs in the future, a person may work from where ever, when ever and use the cloud ? Well, that is a question to be answered. One thing though is sure that we will have to evolve from our current working, education and skill development culture (or system if like to call it that way) to something more agile, learning oriented , self organized and innovative culture where knowing may become obsolete or of low importance.

The workforce we have today is more robust than agile and adaptive. It is a result of an age old education and working culture which was established in the Victorian period or the Age of Empires and has survived strongly till today. As Dr. Mitra pointed out in one of his TED talks that the need back then was to produce identical people who like the spare parts of a big computer (made full of people ) worked in synchronization and if one failed the other identical one could replace the old one. They set up a system so well constructed and robust he says, that it is still with us. We have failed to move ahead of it. The work culture where the employees aren't empowered. The freedom to seek curiosity and innovate out of it, isn't a big part of the working culture in India yet. In the age when we are making intelligent and smarter phones, people need to act smarter. When we want phones, tablets, computers and other devices to be able to work for us intelligently, we too need to act intelligent and evolve in the sense that we need to tap in the power that  mobile and digital technology have given us. The education and skills development system where the learner (or you may call it a student ) is not empowered but an instructor ( teacher )  forces knowing as a method to the pupils. It is imperative now for the skills development sector along with the education system to make the best use of technology and digitize itself.

 As agile has spread its roots in software development, it now needs to be accepted and implemented well in the working culture and education system that we have. The working culture and skills development go hand in hand with education being the backbone behind them. In agile, there are short spans set up to perform a task and a feedback is taken. The participants succeed or fail quicker. Since its a quick success or failure, agile gives an opportunity for quick feedback and adapt to the failures. This helps in adapting to changes quicker and evolve with real time. For instance, how many times does a curriculum in any skill development organization changes ? How quick the feedback from the industry are and how quickly does it adapt to the feedback will hold the key for better skill development programs. Similarly in education system today how quickly does the teacher or instructor adapt to the personal talents of each student? How does he adapt to different ways a student may be able to learn ? Is there a quick feedback of success and failure ? These factors in my opinion can help change the face of education system but one of the most important things will be to change the role of instructor to mediator who helps trigger learning rather than forcing just the habit of knowing. This will empower the student to learn the way he can. This will empower him by developing his ability to learn on his own. The core values though have to be imparted during any skill development program and they can be developed by reiterating the incidences which show that these are necessarily needed for further learning.

In the working culture in our industry, especially in the IT sector we need this more than ever now. The employer like the emperors in the Age of Empires doesn't like to empower his employees. The work force is so robust that they are reluctant to adjust and adapt. The very premise of agile, adaptability has to become a major part of work culture. I will like to narrate a very short story here. One of my old friend, a founder of well known start up company told me that he used to be very frustrated with the loss of productivity in his start up and he thought it was urgent to do something about it. His good and talented employees were willing to leave the organization. No one seemed ready to adjust and adapt. Negativity had just started to crawl in the system when an idea struck to him. He told me that he allowed his employees to work from where ever and when ever. Then the distribution of work was in a way that few employees had to overlap their time to discuss things. Since, the founder started to adapt and tried new things based on short success and failures in his employees productivity, it started to have its effect on the people in the company. They started adjusting. If an employee is not available on one channel, they tried other and didn't crib about other availability and non availability. The productivity did rise. It is amazing how small changes in short sprints based on the open minded feedback can turn around things. The maturity though, to adapt to this method of agile in the way of working and not just programming style is lacking in IT sector in India which prevents a lot of CEOs from adapting Smart policies which will have agile as the basis.

Some CEOs fear that if they empower the employees too much and give them just a bit too much freedom then it may result in high loss of company's core values. Though their fear seems valid, yet bringing agile as a work culture will surely help. The empowered and adapting employees are happier than the less empowered ones. To tell and retell the stories to the new and old employees can help in keeping the core values of the company in place. Telling the employees stories about the accomplishments and success of the companies will help them build confidence in those core values and narrating the incidences when company overcame negative and tough situations using those core values will help build the trust.

The maturity which is lacking has to be imparted as a part of skills development programs. The skills development programs themselves today need to evolve in short spans and be more agile than ever before. The focus should be self organization along with other skills imparted to have that mature work force ready to go out in the larger competitive world. Agile - Self organized learning and Agile - self organized working should be motto to ready the work force to perform their best.

The three keywords - Adapt, Empower and Narrate (Communicate) will help develop a better working culture and skills development sector in my opinion. In the age of Smart Devices and systems I wish we can become smarter people.


- Rishish Dubey








Tuesday, 26 February 2013

दीवाने

हमारी ख़ता बस इतनी ही है
मोहब्बत में उनकी दीवाने हुए हैं

ख़ुद को संभालें कि दिल को संभालें
बर्बाद दिल हम बिखरे पड़े हैं

भरोसा दिलाते हैं वो मुझको लेकिन
अब अपने ही दिल का भरोसा नहीं है

कि मर जाते कब के मगर जी रहे हैं
जीने की उनको कसम दे चुके हैं

साकी कहीं , पैमाना कहीं है
शराबी नहीं हैं मगर पी रहे हैं

कुछ नहीं है  ये दुनिया मुक़द्दर है 'राही '
नसीब अपने अपने मुक़र्रर हो रहे हैं

हमारी ख़ता बस इतनी ही है
मोहब्बत में उनकी दीवाने हुए हैं

Thursday, 24 January 2013

।। माया सत्य का ही प्रतिबिम्ब है ।।


सुबह की शांत प्रार्थना में
शाम की मधुर ध्वनियों में
धुप की जलती किरणों में
रात की चुभती सर्दी में
प्रश्न मन में उठता है
सत्य क्या असत्य क्या है
मोह क्या माया क्या है
मैं क्या हूँ मेरा क्या है ।।

सदैव बदलती ऋतुओं  में
जीवन में और म्रत्यु में
चिर विचरण इस जग में
जो है सब बदलता है
कुछ से कुछ और ही बनता है
सत्य क्या असत्य क्या है
मोह क्या माया क्या है
मैं क्या हूँ मेरा क्या है ।।

काल की अदभुत धारा में
नश्वर शरीर की आत्मा में
अंतर्ज्ञान की गहराई में
प्रत्यॆक आते जाते क्षण में
कुछ मेरा नहीं सब मेरा है
विचार सब सापेक्ष  हैं
ब्रह्माण्ड पल का बिम्ब है
माया है सब सब माया है
माया सत्य का ही प्रतिबिम्ब है ।।