Monday, 8 October 2012

ऐब

आँखों के समंदर से आंसू बेईम्तिहान निकले
उसके साथ भी निकले, उसके बाद भी निकले ||

यूँ तो कुछ नहीं है खास मुझ में 'राही' लेकिन
जल जाये ज़माना भी, जो मेरे साथ वो निकले ||

बाकी रह गए अब कोई अरमान नहीं मगर
दिल में उठती है लहर अब भी, उसका ज़िक्र जो निकले ||

हर मोड़ पे रुकते रहे, कदम कदम संभले
तौबा ही करनी थी तो , जाने घर से क्यूँ निकले ||

अपनी फितरत - ओ - करम पर, मुझको था एक गुमान
गिन ना सका मैं भी, की मेरे ऐब यूँ निकले ||

आँखों के समंदर से आंसू बेईम्तिहान निकले
उसके साथ भी निकले, उसके बाद भी निकले ||

2 comments:

  1. Speechless!!!
    Seems like u have replicated the dilemma of my heart..
    Such a beautiful expression of some extra ordinary feelings for someone really special.....
    Really nice composition dost..

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  2. :)

    You should also read Pablo Neruda:

    "I love you as certain dark things are to be loved,
    in secret, between the shadow and the soul."

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