Tuesday, 4 September 2012

प्यार

Courtesy : Neha Dubey
वो  क्या है जो आग को पानी से मिला दे
बुझने ना दे तपिश उसकी, पर प्यास को बुझा दे
महासागर में पिघल रहे सूरज को देखो
जैसे सोने का दीपक कोई बुझने को हो
रात गहराने लगी हो
लहरें शोर मचाने लगीं हों
और नींद सागर को आने लगी हो
तो वो ख़ुद को मिटा रहा है
अस्तित्व अपना छोड़ कर
सोने की चादर सागर को ओढ़ा रहा है
वो तो सागर को सुला रहा है
वो तो ख़ुद को मिटा रहा है
प्यार है उसे. वो प्यार निभा रहा है
पिघल रहा है सूरज, सागर को सजा रहा है
वो तो सागर को सुला रहा है
प्यार है उसे. वो प्यार निभा रहा है |
वो प्यार है, हाँ वो प्यार ही है
जो आग को पानी से मिला दे
बुझने ना दे तपिश उसकी, पर प्यास को बुझा दे ||

4 comments:

  1. after reading your Poem I am feeling like i have just started to write Poem..Great buddy..such a nice combination of using words...i also have poem blog in blogspot.. but your writing style is simple awesome

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    1. Thanks Nikhil. I am humbled. Keep writing. One doesn't write books or poems..they write themselves :)

      All the very best.

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  2. very beutifully written Rishish. I am thrilled. I read this poem 3 times already and don't want to stop :)

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  3. Love is in the air and everywhere...
    The nature is full of love....
    But only dos people can understand the depth of true love who are lucky enough to have someone very very special in their lives who deserves that kinda love...
    Really gr8 composition.. :)

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