Monday, 27 August 2012

अंतर्द्वंद

इस छोर से, उस छोर से
हर ओर ने किसी डोर से
बाँध लिया है चंचल मन
इधर जाऊं की उधर जाऊं
जाने ये कैसा मकडजाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

है राम की या इस्लाम की
जाने किसके नाम की
है धरा और किसके हम
मंदिर जाऊं या मस्जिद जाऊं
जाने ये कैसा धरमजाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

विज्ञानं में और ध्यान में
स्वाभिमान में और अपमान में
है अंतर क्या बड़ी उलझन
ये क्यूँ वो क्यूँ नहीं
जाने ये कैसा बवाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

है भूत क्या और भविष्य क्या
परोक्ष क्या, प्रत्यक्ष क्या
है नियति क्या, क्या जीवन
कल हो चूका या कल होगा
जाने काल की कैसी चाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

क्यूँ ख़ुशी और अश्रु में
जीवन में और म्रत्यु में
भेद करते हैं अपन
क्यूँ जियूं, क्यूँ ना मरुँ
जाने ये कैसा सवाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

5 comments:

  1. Kya baat hai!! very nice :)

    -Neha

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  2. too good ...after a long time such good hindi :)

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  3. as good as ever dubey....reading ur blog for the first time...proud of u!!!

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  4. Awesome words selection. We are lucky to have such a great talent.

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  5. क्या खूब लिखा ए दोस्त ..
    अंतर्मन का बवाल और ये मायाजाल
    समझ सोच से परे, सदियोंसे है ये सवाल !

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