Monday, 27 August 2012

अंतर्द्वंद

इस छोर से, उस छोर से
हर ओर ने किसी डोर से
बाँध लिया है चंचल मन
इधर जाऊं की उधर जाऊं
जाने ये कैसा मकडजाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

है राम की या इस्लाम की
जाने किसके नाम की
है धरा और किसके हम
मंदिर जाऊं या मस्जिद जाऊं
जाने ये कैसा धरमजाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

विज्ञानं में और ध्यान में
स्वाभिमान में और अपमान में
है अंतर क्या बड़ी उलझन
ये क्यूँ वो क्यूँ नहीं
जाने ये कैसा बवाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

है भूत क्या और भविष्य क्या
परोक्ष क्या, प्रत्यक्ष क्या
है नियति क्या, क्या जीवन
कल हो चूका या कल होगा
जाने काल की कैसी चाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

क्यूँ ख़ुशी और अश्रु में
जीवन में और म्रत्यु में
भेद करते हैं अपन
क्यूँ जियूं, क्यूँ ना मरुँ
जाने ये कैसा सवाल है
जाने ये कैसा अंतर्द्वंद ||

Wednesday, 8 August 2012

तमाशा - dedicated to the victims of Assam riots


Violence of any kind- physical, mental, communal , ethnic , regional and so on Only brings pain and more pain. Dedicated to the victims of Assam riots. May Good sense prevail. Hope you like it.

आवारा उड़ता हुआ, एक परिंदा मुझको मिला
हमने की कुछ गुफ्तगू , फ़िर बंजारा वो उड़ चला ||

चुपके से उसने कहा , दुनिया का हाल बुरा
ऐ मौला क्यूँ ये बेरुखी, ये तमाशा क्या है भला ||

चार कच्ची दीवारों का , घर था कुछ लोगों का
खुश थे उसमें सभी, वो पंच्छी  और कहता गया  ||

फ़िर एक दिन ऐसा हुआ, नफरत के शोले जले,
गलियों से धुआं उठा, वो मेरा घर भी जल गया ||

बेघर सब होने लगे, अपनों को खोने लगे
जाने क्यूँ थमता नहीं , नफरत का ये सिलसिला ||

चुपके से उसने कहा , दुनिया का हाल बुरा
ऐ मौला क्यूँ ये बेरुखी, ये तमाशा क्या है भला ||

आवारा उड़ता हुआ, एक परिंदा मुझको मिला
हमने की कुछ गुफ्तगू , फ़िर बंजारा वो उड़ चला ||

क्या मंदिर या मस्जिद कोई, जाने क्या उसका पता
हाथ आये तो बस है बुत, ना आये तो है ख़ुदा ||

बहनों को कर बेआबरू, अपनों का पीके लहू
कोई भी ना था सुकून, वो दीवाना रोने लगा ||

क्या तेरी या मेरी ज़मीं, क्या तेरा या मेरा ख़ुदा
जाऊं तो जाऊं कहाँ, वो जाने को होने लगा ||

आँखों से आंसू बहे, अब दिल ये बस ये कहे
आजा तू अब आ भी जा, तू ही कर कुछ फैसला ||

चुपके से उसने कहा , दुनिया का हाल बुरा
ऐ मौला क्यूँ ये बेरुखी, ये तमाशा क्या है भला ||

आवारा उड़ता हुआ, एक परिंदा मुझको मिला
हमने की कुछ गुफ्तगू , फ़िर बंजारा वो उड़ चला ||

Tuesday, 7 August 2012

दीवाना

मेरे दिल का जो आलम है, वही अफसाना पुराना है
मेरा कातिल कोई और नहीं है , खुद मेरा दीवाना है ||

जो सीने में चुभते रहते थे, अब धीरे धीरे बहते हैं
ये मेरे आंसू नए नहीं हैं, एक एक दर्द पुराना है ||

आँखों में हर पल बसने वाले, अब वो ख्वाब नहीं आते
सबसे अपने लगते थे जो, अब हर सपना बेगाना है ||

ज़र्रे ज़र्रे से थी पहचान, घर वो ना मुझको जाने है
आईने में अब जो अक्स मेरा , वो 'राही' भी अनजाना है ||

दैर-ओ-हरम में जाने वाले, साकी कैसे ये जानें,
जिसके अरमान कतल हुए हों, उसके लिए मयखाना है ||

मेरे दिल का जो आलम है, वही अफसाना पुराना है
मेरा कातिल कोई और नहीं है , खुद मेरा दीवाना है ||