Tuesday, 10 January 2012

कि तू होती .... एक खयाल



अकेला घूमता हूँ, आसमान को देखता हूँ, सोचता हूँ मैं
कि तू होती साथ तो ये जहाँ रंगों से भर जाता

कोरे कोरे कागजों पे अब  कलम बस फेरता हूँ मैं
कि तू होती साथ तो हर लम्हा ग़ज़ल ही बन जाता

काली रातें हैं, फ़ीकी सुबह भी देखता हूँ मैं
कि तू होती साथ तो हर रात-ओ-दिन सूफियाना हो जाता

है काफिर मगर माना कि 'राही' दुनिया की नज़रों में
की तू होती साथ तो ख़ुदा मुझको भी मिल जाता

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