Saturday, 14 May 2011

शहर


तुम किया करते थे फक्र से इस शहर की बात 
फकत आबाद यहाँ दौलत, दिल-ओ-ज़ेहन बर्बाद

क्या खरीदें और क्या बेचें खुल गया बाज़ार
एक टूटा दिल और कुछ ग़ज़लें, राही की औकात.

किस से पूछें यहाँ की देगा क्या कोई मेरा साथ
फितरतों में है बेवफाई, और इरादे नापाक 

माना बड़े बड़े हैं मकान दर-ओ-दीवार
लम्बी बहुत हैं लेकिन यहाँ तन्हाई की रात

तौबा करते हैं शहर से, आई गाँव की याद
यहाँ कोई नहीं अपना, ना कोई जज़्बात

अपने हाथों की बनी रोटी और सरसों का साग
बना के करती होगी वहां माँ, मेरा इंतज़ार.

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