Tuesday, 2 February 2010

बस चले आना

हमें मोहब्बत है आपसे,
आपकी तबस्सुम से.
ये लबों का हिलना मुस्कुराने के लिए
जैसे कोई जादू हो गम-ए-दिल मिटाने  के लिए.
इसकी खातिर, पेशे खिदमत कुछ भी सरकार करेंगे
वक़्त जो  आपने माँगा है , बहुत थोड़ा है
उम्र भर हम आपका इंतज़ार करेंगे.
बस आना कभी जो आप तो यूँ ही आना
लब सिले न हों, गम कोई न हो
मुस्कराहट का मरहम हो, इस दिल के लिए
वो जादू जो तबस्सुम का , उसे लेते आना !
राह-ए-उम्र पड़ी है 'राही' का सफ़र
जब आपकी मर्ज़ी हो बस चले आना!

4 comments:

  1. Waah waah! kya baat hai... mast likhi hai ekdum.
    Mujhe to samajh nahi aata comments kya daalo. Words nahi soojhte :)

    really very nice. good going keep it up

    -NEHA

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  2. but how these lines form a poem? looks more like prose if not written "like " poem :)

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  3. waise mohabbat hai aapse bhi aur tabassum se bhi! ye kya baat hai.. ye tabassum kaun hai :D
    aur log tareef bhi kar dete hain :D

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  4. @anonymous. second number comment. No one said its a poem. Its collection of thoughts and words :) get the title of the blog man! Its random Mess! :)

    - Raahi

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